नई दिल्ली: कर्नाटक की राजनीति में कांग्रेस का अहम चेहरा डीके शिवकुमार. यही वो ही नाम है, जिसके दम पर कर्नाटक में बीजेपी की सरकार को बहुमत से दूर रखा गया और यदियुरप्पा को शपथ लेने के बाद भी 55 घंटे के अंदर इस्तीफा देना पड़ा. कांग्रेस की तरफ से विधायकों की बाड़ेबंदी का पूरा इंतजाम कांग्रेस नेता डी.के. शिवकुमार ने ही किया था. सिद्धारमैया सरकार में डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार ऊर्जा मंत्री थे. कर्नाटक कांग्रेस में वोकालिग्गा समुदाय से आने वाले बड़े नेता हैं. लेकिन, कांग्रेस के लिए पॉलिटिकल मैनेजमेंट में माहिर डीके अब नाराज हो गए हैं. कुमारस्वामी के फ्लोर टेस्ट से पहले उनकी नाराजगी की वजह है पार्टी और सरकार में अहम पद. माना जा रहा था कि वह अपने लिए उप मुख्यमंत्री का पद चाहते थे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका.
कांग्रेस के लिए लकी है इनका रिजॉर्ट
जब गुजरात में कांग्रेस के विधायक एक-एक कर भाजपा में शामिल होते जा रहे थे और अहमद पटेल की नैया मझधार में फंसने लगी तब कांग्रेस के बचे 44 विधायकों को बंगलुरु के पास 'ईगलटन रिजॉर्ट' ले जाया गया. ये रिजॉर्ट डीके शिवकुमार का ही था. यहां की गई बाड़ेबंदी से अहमद पटेल चुनाव जीत गए. यही कर्नाटक विधानसभा चुनाव में देखने को मिला.
एचडी कुमारस्वामी को भी हराया
यह कुमारस्वामी की लगातार तीसरी हार थी. इससे पहले दो चुनाव वो हार चुके थे. 1999 में कुमारस्वामी के चुनाव हारने के बाद दोनों गुटों की रंजिश अपने चरम पर थी. शिवकुमार इस वक्त पर देवेगौड़ा पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे थे. वजह थी उनकी बढ़ती सियासी हैसियत. वो 1999 में बनी एस. एम. कृष्णा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर बन गए थे. उन्हें शहरी विकास जैसा जरूरी मंत्रालय मिला.
देवगौड़ा से तीसरी टक्कर
तीसरी टक्कर हुई 2004 में. इस साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ-साथ हो रहे थे. देवगौड़ा फिर से दो सीट हासन और कनकापुरा पर चुनाव लड़ रहे थे. कृष्णा ने शिवकुमार के साथ मिलकर कनकापुरा सीट पर देवेगौड़ा के खिलाफ तेजस्विनी गौड़ा को टिकट दिया. राजनीति में आने से पहले वो कन्नड़ न्यूज चैनल उदया टीवी में एंकर हुआ करती थीं. तेजस्विनी ने कनकापुरा सीट से बड़ा उलटफेर कर दिया. वो 5,83,920 वोट के साथ इस चुनाव में जीत गईं. देवेगौड़ा 4,62,320 वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहे.
गांधी परिवार के करीबी
महाराष्ट्र में सरकार बचाने में शिवकुमार का योगदान उन्हें गांधी परिवार की नजरों में ले आया. वो कर्नाटक में कांग्रेस के ट्रबलशूटर बन गए. 2009 में इन्हें कर्नाटक कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था. 2013 में चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने अपनी 250 करोड़ की संपत्ति बताई थी. वो कर्नाटक के सबसे अमीर उम्मीदवारों में से थे.
Source:-Zeenews
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कांग्रेस के लिए लकी है इनका रिजॉर्ट
जब गुजरात में कांग्रेस के विधायक एक-एक कर भाजपा में शामिल होते जा रहे थे और अहमद पटेल की नैया मझधार में फंसने लगी तब कांग्रेस के बचे 44 विधायकों को बंगलुरु के पास 'ईगलटन रिजॉर्ट' ले जाया गया. ये रिजॉर्ट डीके शिवकुमार का ही था. यहां की गई बाड़ेबंदी से अहमद पटेल चुनाव जीत गए. यही कर्नाटक विधानसभा चुनाव में देखने को मिला.
एचडी कुमारस्वामी को भी हराया
यह कुमारस्वामी की लगातार तीसरी हार थी. इससे पहले दो चुनाव वो हार चुके थे. 1999 में कुमारस्वामी के चुनाव हारने के बाद दोनों गुटों की रंजिश अपने चरम पर थी. शिवकुमार इस वक्त पर देवेगौड़ा पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे थे. वजह थी उनकी बढ़ती सियासी हैसियत. वो 1999 में बनी एस. एम. कृष्णा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर बन गए थे. उन्हें शहरी विकास जैसा जरूरी मंत्रालय मिला.
देवगौड़ा से तीसरी टक्कर
तीसरी टक्कर हुई 2004 में. इस साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ-साथ हो रहे थे. देवगौड़ा फिर से दो सीट हासन और कनकापुरा पर चुनाव लड़ रहे थे. कृष्णा ने शिवकुमार के साथ मिलकर कनकापुरा सीट पर देवेगौड़ा के खिलाफ तेजस्विनी गौड़ा को टिकट दिया. राजनीति में आने से पहले वो कन्नड़ न्यूज चैनल उदया टीवी में एंकर हुआ करती थीं. तेजस्विनी ने कनकापुरा सीट से बड़ा उलटफेर कर दिया. वो 5,83,920 वोट के साथ इस चुनाव में जीत गईं. देवेगौड़ा 4,62,320 वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहे.
गांधी परिवार के करीबी
महाराष्ट्र में सरकार बचाने में शिवकुमार का योगदान उन्हें गांधी परिवार की नजरों में ले आया. वो कर्नाटक में कांग्रेस के ट्रबलशूटर बन गए. 2009 में इन्हें कर्नाटक कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था. 2013 में चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने अपनी 250 करोड़ की संपत्ति बताई थी. वो कर्नाटक के सबसे अमीर उम्मीदवारों में से थे.
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